प्राथमिक चिकित्सा: परिभाषा, उद्देश्य और मूल सिद्धांत
परिभाषा (Definition): किसी दुर्घटना, चोट या अचानक बीमारी की स्थिति में, डॉक्टर या एम्बुलेंस (पेशेवर चिकित्सा) के आने से पहले घायल व्यक्ति को दिया जाने वाला तुरंत और शुरुआती उपचार प्राथमिक चिकित्सा (First Aid) कहलाता है।
दुर्घटना या अचानक बीमारी होने पर, प्रशिक्षित डॉक्टर या एंबुलेंस के पहुंचने से पहले, पीड़ित को दी जाने वाली तुरंत और प्रारंभिक सहायता को प्राथमिक चिकित्सा कहा जाता है।
जनक: फ्रेडरिक एस्मार्क (Friedrich Esmarch) को औपचारिक रूप से प्राथमिक चिकित्सा का जनक माना जाता है।
विश्व प्राथमिक चिकित्सा दिवस: यह हर साल सितंबर महीने के दूसरे शनिवार को मनाया जाता है।
प्राथमिक चिकित्सा के उद्देश्य
1. घायल व्यक्ति की तात्कालिक सहायता करना :
घायल व्यक्ति की वास्तविक चिकित्सा तो चिकित्सक ही करता है किन्तु चिकित्सक तक पहुंचने के लिए घायल की स्थिति की गम्भीरता से बचने के लिए यथासम्भव तुरन्त ही उपलब्ध साधनों के अनुसार उसकी सुरक्षा की व्यवस्था करना प्राथमिक चिकित्सा का प्रथम उद्देश्य है।
2. जीवन रक्षा करना :
प्राथमिक चिकित्सा का दूसरा प्रमुख उद्देश्य घायल व्यक्ति की जीवन रक्षा करना है। इसके लिए प्राथमिक चिकित्सक को अपनी सुझबूझ व विवेक से काम लेना होता है। उसे उसकी जीवन-रक्षा के लिए चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध होने तक सभी प्रयत्न एवं उपाय करने चाहिए।
3. दुर्घटना की गम्भीरता को बढ़ने से रोकना :
प्राथमिक चिकित्सा करने वाला चिकित्सक नहीं होता। यह चिकित्सा केवल उतने ही समय के लिए की जाती है जब तक डॉक्टरी सहायता उपलब्ध न हो जाये। प्राथमिक चिकित्सा का कार्य आकस्मिक दुर्घटनाओं के अवसर पर तत्काल प्राप्त सामान के आधार पर रोगी का यथासमय उपचार करने से है।
प्राथमिक उपचार पेटी (फर्स्ट एड बॉक्स)
प्राथमिक चिकित्सा की आवश्यक सामग्री:
जिस बॉक्स में प्राथमिक चिकित्सा सम्बन्धी सामग्री एकत्रित करके रखी जाती है उसी बॉक्स को प्राथमिक चिकित्सा बॉक्स कहते हैं।
| आवश्यक दवाइयां | उपयोग |
| दर्द निवारक गोलियां | सरदर्द, पेट दर्द, बुखार, जुकाम, खांसी, उल्टी, दस्त, ठण्ड लगने पर चक्कर आने पर दी जाने वाली दवा। |
| अमृत धारा | हैजा, उल्टी, दस्त |
| पचनौल | अपचय, पेटदर्द |
| ग्लूकोज | चक्कर आना, कमजोरी व ऊर्जा देने हेतु |
| बोरोलीन एवं अम्ल मल्हम | घाव पर लगाने हेतु, जली त्वचा पर लगाने हेतु |
| ग्लिसरीन | मुंह में छालों के लिए |
| बरनोल, नारियल जैतून का तेल, फिटकरी | घाव के बहते रक्त को रोकने हेतु |
| स्प्रिट, बोरिक पाउडर, टिंचर | उपकरणों एवं घावों को रोगाणु रहित करने हेतु |
| आयोडेक्स | घाव रहित चोट पर हल्की मालिश हेतु |
| लैक्यूला और आईटान | आंखों के संक्रमण दूर करने हेतु |
अन्य दवाइयाँ: पेरासिटामोल, कुनैन, सैरीडॉन, बोरिक अम्ल, आई ड्रॉप, पुदीन हरा, सोडा मिंट, कोडा पायरिन, बीटाडोन, गुलाब जल, एस्स्रो, नावलजीन, सफ्रोमाइसिन, निवासल पाउडर आदि बॉक्स में रखनी चाहिए।
| आवश्यक वस्तुएं | उपयोग |
| विभिन्न प्रकार की कीटाणु रहित पट्टियां, पैड्स | टूटे हुए व घायल अंगों एवं भुजाओं को सहारा देने हेतु |
| रूई का बंडल | पट्टी बांधने व घावों को साफ करने हेतु |
| नाखून कटर, ब्लेड लगा रेजर | नाखून एवं बालों को काटने हेतु |
| खपच्ची के टुकडे | अस्थि भंग होने की स्थिति में बांधने हेतु |
| सूत की डोरी | पैरों को बांधकर विष फैलने से रोकने हेतु |
| दियासलाई, मोमबत्ती या गैस | प्रकाश लाने हेतु |
| चम्मच या गिलास | पानी या दवा देने हेतु |
अन्य सामान: बर्फ रखने का थैला, गर्म पानी की थैली, थर्मामीटर, सरसों का तेल, बैंड़एड कैंची, चाकू, चिमटी, सीरिंज व ब्लेड आदि भी बॉक्स में रखना चाहिए।
गोल्डन ऑवर (Golden Hour) क्या है? दुर्घटना के तुरंत बाद का पहला एक घंटा (1 Hour) ‘गोल्डन ऑवर’ कहलाता है। इस समय में दी गई सही प्राथमिक चिकित्सा मरीज के बचने की संभावना को 80% तक बढ़ा देती है।
महत्वपूर्ण मेडिकल हेल्पलाइन नंबर
108: आपातकालीन एंबुलेंस सेवा (Emergency Ambulance)
104: जननी एक्सप्रेस / चिकित्सा परामर्श हेल्पलाइन (Medical Advice & Grievance Helpline)
112: एकीकृत आपातकालीन नंबर (Integrated Emergency Action – पुलिस, एंबुलेंस, फायर)
प्राथमिक चिकित्सा में ‘सहमति’ (Consent in First Aid)
कानूनी और नैतिक दृष्टिकोण से प्राथमिक चिकित्सा देने से पहले सहमति लेना आवश्यक है। परीक्षाओं में इसके दो प्रकार पूछे जा सकते हैं:
- व्यक्त सहमति (Expressed Consent): यदि मरीज होश में है, तो आपको मदद करने से पहले उससे अनुमति लेनी होगी (जैसे- “मैं फर्स्ट एड जानता हूँ, क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूँ?”)।
- निहित सहमति (Implied Consent): यदि मरीज बेहोश है, भ्रमित है, या गंभीर रूप से घायल होने के कारण जवाब नहीं दे सकता, तो कानून यह मान लेता है कि उसे मदद की जरूरत है। इसे ‘Implied Consent’ कहा जाता है।
पट्टियों के प्रकार (Types of Bandages)
- त्रिकोणीय पट्टी (Triangular Bandage): हाथ की हड्डी टूटने या कलाई में मोच आने पर हाथ को गले से लटकाकर सहारा देने के लिए ‘स्लिंग’ (Sling) या ‘झोली’ बनाने में इसका सबसे ज्यादा उपयोग होता है।
- रोलर पट्टी (Roller Bandage): घाव पर ड्रेसिंग को जगह पर रोके रखने के लिए।
- फिगर ऑफ एइट (Figure of 8 Bandage): जोड़ों (जैसे टखने, घुटने या कोहनी) की मोच पर दबाव बनाने के लिए पट्टी बांधने का यह तरीका सबसे कारगर है।
प्राथमिक चिकित्सक
मानवता के नाते वह किसी भी प्रकार की दुर्घटना घटित होते ही उस स्थान पर उपस्थित व्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को यथासमय सहायता प्रदान कर सकता है। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति प्राथमिक चिकित्सक की भूमिका निभा सकता है।
प्राथमिक चिकित्सक के गुण :
- अच्छे स्वास्थ्य व मजबूत हृदय वाला होना चाहिए।
- प्राथमिक चिकित्सा सम्बन्धी पूर्ण ज्ञान होना चाहिए।
- साधन सम्पन्न होना चाहिए।
- सूझ वाला तथा दूरदर्शी होना चाहिए।
- तुरन्त निर्णय लेने वाला होना चाहिए।
- विवेकशील होना चाहिए।
- चतुर, दक्ष होना चाहिए।
- धैर्यवान और आशावान होना चाहिए।
- आत्मविश्वासी होना चाहिए।
- स्थानीय भाषा का ज्ञान होना चाहिए।
प्राथमिक चिकित्सा और सावधानियाँ :
1. नाड़ी की गति का परीक्षण : हृदय की धड़कन की अवस्था का पता नाडी की गति से चलता है। नाड़ी की गति का अनुभव कई स्थानों पर किया जाता है लेकिन उपयुक्त स्थान कलाई के सामने के भाग में अंगूठे की दिशा में दो अंगुलियां रखने से किया जा सकता है। सामान्य नाडी की गति 72 से 80 बार प्रति मिनट होती है। नाड़ी की निश्चित गति जानने के लिए प्रत्येक 15 मिनट बाद नाड़ी को गिनना चाहिए। प्रत्येक बार एक ही गणना आये तो नाड़ी स्थिर एवं निश्चित है, अन्यथा अस्थिर एवं अनिश्चित है।
2. रोगी का तापमान लेना : रोगी का समय-समय पर तापमान लेते रहना चाहिए एवं उसकी तारीख व समय लिखते रहना चाहिए। तापमान थर्मामीटर से लिया जाना चाहिए। थर्मामीटर को रोगी की जीभ के नीचे रखना चाहिए। यहां दो-तीन मिनट रखना चाहिए। इसके पश्चात् थर्मामीटर निकालकर तापमान पढ़ना चाहिए। सामान्य व स्वथ्य व्यक्ति का तापमान 98.4° होना चाहिए। छोटे बच्चों के मुंह में थर्मामीटर नहीं लगाया जा सकता। अतः थर्मामीटर उनकी बगल या जांघ पर लगाना चाहिए।
3. श्वास प्रक्रिया का निरीक्षण : रोगी की श्वास प्रक्रिया का निरीक्षण करना चाहिए। श्वास की गति जानने के लिए छाती या पेट के ऊपर हाथ रखकर धड़कन प्रति मिनट गिननी चाहिए। सामान्यतः श्वास की गति एक मिनट में 15 से 20 तक होती हैं।
4. मलमूत्र विसर्जन करना : जो रोगी शौचालय तक नहीं जा सकते, उन्हें शौच आदि बिस्तर पर ही बर्तन में कराना चाहिए। मलमूत्र कराने से पूर्व बिस्तर पर रबर को बिछा देना चाहिए जिससे पानी के छींटे बिस्तर पर न पड़े। मल-त्याग के बाद सादे पानी, टायलेट पेपर, गीली रूई से गुदा मार्ग को साफ करना चाहिए। यदि रोगी शौचालय तक जाने लायक हो तो उसे सहारा देकर शौचालय तक ले जाना चाहिए। शौच वाले जल में डिटॉल डाल दे। रोगी के हाथ कीटाणुनाशक साबुन से धुलवाने चाहिए।
5. रोगी को स्नान कराना : रोगी को गर्म पानी से स्नान कराना चाहिए। यदि रोगी पूर्ण स्नान की स्थिति में नहीं हो तो उसके शरीर को तौलिया गीला करके पौंछ देना चाहिए। स्नान कराते समय कमरे की खिड़किया बंद कर देनी चाहिए।
6. दांत, जीभ एवं मुंह की सफाई : निरन्तर रोगी के दांत व जीभ की सफाई करवाई जानी चाहिए। रोगी यदि बैठने लायक हो तो उसके पीछे तकिया लगाकर सकी जीभ व दांत साफ कराकर कुल्ले करा देने चाहिए। कुल्ले सदैव विसंक्रामक घोल से करवाने चाहिए। रात्रि में सोने से पूर्व अच्छी तरह कुल्ला करवाना चाहिए।
7. रोगी को दवा देना : रोगी को दवा समय पर सावधानीपूर्वक देनी चाहिए। थोड़ी सी असावधानी से भयंकर परिणाम निकल सकते हैं। रोगी को दवा सदैव डॉक्टर के निर्देशानुसार समय, मात्रा, प्रयोग विधि के अनुसार देनी चाहिए।
विभिन्न आपातकालीन स्थितियों का प्रामाणिक उपचार
(1) अत्यधिक रक्तस्राव (Severe Bleeding)
पहला कदम: घाव पर सीधे साफ कपड़े या स्टेराइल गेज से प्रत्यक्ष दबाव (Direct Pressure) डालें।
ऊंचाई (Elevation): यदि हाथ या पैर में घाव है, तो उसे हृदय के स्तर से ऊपर उठाएं ताकि रक्त प्रवाह कम हो।
टूर्निकेट (Tourniquet): जब दबाव से खून न रुके, तब घाव के ऊपर कसकर पट्टी (टूर्निकेट) बांधी जाती है। इसे हर 15-20 मिनट में ढीला करना अनिवार्य है।
घाव के प्रकार-
1. कटा हुआ घाव : ये घाव गहरे होते हैं। चोट लगने पर धमनियां या नाड़ियां भी कट जाती हैं। कांच घुसने, चाकू या ब्लेड से घाव हो जाते हैं।
2. कुचला हुआ घाव : कई बार हाथ या जोड़ की अंगुलियों के कुचल जाने से घाव हो जाते हैं, जिससे नील भी पड़ जाती है एवं पीड़ा भी होती है।
3. फटा हुआ घाव : यह घाव कटे एवं कुचले हुए घाव से अधिक खतरनाक होता है। घाव के किनारे फटे-फटे से एवं टेड़े-मेंड़े होते है। इसमें से रक्त अधिक नहीं बहता किन्तु इनके विषैले होने का अधिक भय रहता है। घाव के भर जाने पर भी शरीर पर स्थायी एवं भद्दे निशान पड़ जाते है।
धमनी के रक्तस्त्राव :
धमनी के कट जाने पर रक्त अत्यन्त चमकीले लाल रंग का निकलता है। यदि कटी हुई धमनी हृदय के पास है तो रक्त रूक-रूक कर हृदय की धड़कन के साथ झटके से बाहर आता है। इससे रक्त का स्राव हृदय की ओर होता है।
लक्षण :
- धमनी का रक्त चमकीला, लाल तथा शुद्ध होता है।
- इसके उछलने की गति हृदय की धड़कन के अनुसार होती है।
उपचार :
- घायल व्यक्ति को लिटा देना चाहिए
- रक्त बहने वाले अंग को ऊपर उठा देना चाहिए।
- घाव पर मजबूती से कपड़ा बांध देना चाहिए।
- रक्त व घाव रोकने के लिए टिंचर आयोडिन या फैरिक क्लोराइड़ का घोल लगाना चाहिए।
- घाव व घाव के आसपास की त्वचा पर ऐन्टी सेप्टिक घोल छिड़क देना चाहिए तथा टैटबैक का इंजेक्शन लगवाना चाहिए।
- यदि कोई विजातीय पदार्थ में फंसा हुआ हो तो सर्वप्रथम उसे सावधानी से निकाल दे।
शिरा के रक्तस्राव :
- शिरा से बहने वाला रक्त नीलापन लिये हुए गहरे लाल रंग का होता है।
- इसका बहाव हृदय की ओर धीरे-धीरे होता है।
- यह एक बंधी हुई धार में बहता है।
उपचार-
- लाल दवा में या किसी कीटाणुनाशक दवा के घोल में कपड़ा भिगोकर रक्त बहने वाले स्थान पर पट्टी बांध देनी चाहिए।
- घायल अंग पर हृदय के विपरीत दिशा में कसकर टूर्नाकेट बांध देना चाहिए।
- घाव को अंगूठे से दबाकर रूई का एक मोटा पैड़ घाव पर रखकर बांध देना चाहिए।
- टिंचर, आयोडिन या सल्फेडाइन या मरकरी क्रीम में से कोई एक दवा लगाकर पट्टी बांध देनी चाहिए।
कोशकीय रक्तस्राव लक्षण:
- अत्यन्त साधारण एवं सामान्य रक्त स्राव है।
- रक्त अत्यन्त मंद गति से बहता है।
- इसमें शुद्ध और अशुद्ध दोनों ही प्रकार का रक्त बहता है।
- रक्त का रंग सामान्य लाल होता है।
(2) अस्थिभंग (Fracture) और मोच (Sprain)
परीक्षाओं में इसके लिए PRICE प्रोटोकॉल पूछा जाता है:
- P – Protect (सुरक्षा): चोटिल अंग को और नुकसान से बचाएं।
- R – Rest (आराम): अंग को बिल्कुल न हिलाएं।
- I – Ice (बर्फ): सूजन कम करने के लिए बर्फ की सिकाई करें (सीधे त्वचा पर नहीं, कपड़े में लपेटकर)।
- C – Compression (दबाव): क्रेप बैंडेज (क्रेप पट्टी) बांधें।
- E – Elevation (ऊंचाई): चोटिल हिस्से को थोड़ा ऊपर उठाकर रखें।
नोट: टूटी हड्डी को सहारा देने के लिए लकड़ी या गत्ते की खपच्ची (Splint) का प्रयोग किया जाता है।
(3) जलना (Burns)
- लक्षण: जलने या झुलसने से त्वचा लाल रंग की हो जाती है और शरीर पर पानी से भरे फफोले (छाले) पड़ जाते हैं।
- जलने की गंभीरता को डिग्री में मापा जाता है:
- फर्स्ट डिग्री: केवल ऊपरी त्वचा लाल होती है।
- सेकंड डिग्री: त्वचा पर छाले (Blisters) पड़ जाते हैं।
- थर्ड डिग्री: त्वचा, ऊतक और नसें पूरी तरह जल जाती हैं।
- क्या करें: जले हुए हिस्से पर कम से कम 10-15 मिनट तक बहता हुआ ठंडा पानी (नल का पानी) डालें।, नारियल का तेल लगाना लाभदायक रहता है।, घाव पर बोरोलीन या बरनोल या साधारण बोरिक मलहम या एन्टिसेप्टिक कीम लगानी चाहिए।
- क्या न करें: छाले कभी न फोड़ें। बर्फ का सीधा इस्तेमाल न करें। घी, तेल या टूथपेस्ट,नमक, मिटटी, बिल्कुल न लगाएं।, पानी नहीं डालना चाहिए।
(4) जीव-जंतुओं का काटना
- कुत्ते का काटना (Dog Bite): रेबीज से बचने के लिए घाव को तुरंत साबुन और बहते पानी से 15 मिनट तक अच्छी तरह धोएं। घाव को खुला छोड़ दें (टांके या पट्टी न लगाएं) और एंटी-रेबीज वैक्सीन लगवाएं।
- सर्पदंश (Snake Bite): पीड़ित को बिल्कुल शांत रखें (दौड़ने या घबराने से जहर तेजी से फैलता है)। काटे गए अंग को हृदय के स्तर से नीचे रखें। घाव पर चीरा लगाना या मुंह से जहर चूसना पूरी तरह गलत और अवैज्ञानिक है।
- सर्प के काटने के स्थान के थोड़ा ऊपर की ओर रूमाल, टाई, जूते के फीते या किसी अन्य उपयुक्त वस्तु से कसकर बांध देना चाहिए।
- रोगी को नींद नहीं लेने देना चाहिए।
- घाव को पोटेशियम परमैंगनेट के घोल से धो देवे।
(5) चोकिंग (Choking – गले में कुछ फंसना)
जब श्वास नली में कोई भोजन का टुकड़ा या बाहरी वस्तु फंस जाती है, तो व्यक्ति सांस नहीं ले पाता।
- हेमलिच पैंतरेबाज़ी (Heimlich Maneuver): यह गले में फंसी वस्तु को निकालने की सबसे प्रामाणिक तकनीक है। इसमें पीड़ित के पीछे खड़े होकर उसकी नाभि (Navel) के ठीक ऊपर पेट पर दोनों हाथों से पीछे और ऊपर की ओर झटके (Abdominal thrusts) दिए जाते हैं, ताकि फेफड़ों की हवा के दबाव से फंसी हुई वस्तु बाहर निकल जाए।
(6) मूर्च्छा या बेहोश होना
- कारण: अत्यधिक डर, दुःख, खुशी, थकान, गर्मी, खून की कमी या हृदय रोग।
- लक्षण: चक्कर आना, चेहरा पीला पड़ना, बेचैनी, घबराहट, कमज़ोरी और सांस का धीमा होना।
- प्राथमिक उपचार:
- हवादार स्थान: रोगी को खुली और शांत जगह पर लिटाएं तथा आस-पास से भीड़ हटा दें।
- कपड़े ढीले करें: रोगी के तंग कपड़े, जूते और मोज़े ढीले कर दें या उतार दें।
- पानी के छींटे: चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारें और हवा (पंखा) करें। (यदि चोट से खून बह रहा हो तो पहले उसे रोकें)।
- होश आने पर: रोगी को धीरे से बैठाएं, पीने के लिए चाय, कॉफी या पानी दें और तुरंत डॉक्टर को बुलाएं।
- सांस रुक जाने पर: कृत्रिम श्वास (जैसे- मुख से मुख विधि) देनी चाहिए
(7) लू लगना (Heat Stroke)
चूंकि राजस्थान की परीक्षाओं में यह एक बहुत ही व्यावहारिक विषय है, इसलिए इसके तथ्य अक्सर पूछे जाते हैं:
- हीट एक्जॉशन (लू लगना) बनाम हीट स्ट्रोक: हीट स्ट्रोक गंभीर स्थिति है जिसमें पसीना आना बंद हो जाता है, त्वचा सूखी और लाल हो जाती है, और शरीर का तापमान 104°F या उससे अधिक हो जाता है।
- प्राथमिक चिकित्सा: मरीज के कपड़े ढीले करें, उसे ठंडी जगह पर लिटाएं और शरीर पर पानी की पट्टियां रखें।
- ORS (Oral Rehydration Salts): शरीर में पानी और नमक की कमी (Dehydration) को पूरा करने के लिए। (परीक्षा के लिए तथ्य: WHO प्रमाणित ORS में मुख्य रूप से सोडियम क्लोराइड, पोटेशियम क्लोराइड, सोडियम साइट्रेट और ग्लूकोज/डेक्सट्रोज होता है)।
(8) विषाक्तता (Poisoning – जहर निगलना)
- सबसे महत्वपूर्ण नियम: यदि किसी व्यक्ति ने कोई तेजाब (Acid), क्षारीय पदार्थ (Alkali) या पेट्रोलियम उत्पाद (जैसे मिट्टी का तेल, पेट्रोल) निगला है, तो उसे उल्टी (Vomiting) बिल्कुल नहीं करवानी चाहिए। उल्टी करवाने से ग्रासनली (Esophagus) और गले को दोबारा नुकसान पहुंचता है।
- ऐसे मामलों में तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना ही एकमात्र सही कदम है।
खाद्य विषाक्तता (Food Poisoning)
- कभी-कभी ऐसा होता है कि भोजन करने के कुछ समय उपरांत व्यक्ति बीमार हो जाता है। उन्हें उल्टी, दस्त व पेट दर्द होने लगता है तथा रोगी घबराहट महसूस करता है। उस समय घबराना नहीं चाहिए। यदि रोगी उल्टी करता है तो उसे बन्द करने की दवाई नहीं लेनी चाहिए। रोगी को अधिक पानी पिलाना चाहिए। पानी में अमृतधारा की दो बूंद मिलाकर पिलानी चाहिए। ओ.आर.एस. का घोल पिलाना चाहिए तथा तुरन्त डॉक्टर को दिखाना चाहिए।
(9) मिर्गी का दौरा (Epileptic Seizure)
- क्या करें: मरीज के सिर के नीचे कोई मुलायम कपड़ा या तकिया रख दें ताकि सिर में चोट न लगे। आस-पास की नुकीली चीजों को हटा दें।
- क्या न करें: दौरे के दौरान मरीज को बलपूर्वक रोकने या पकड़ने की कोशिश न करें। उसके मुंह में कुछ भी (जैसे चम्मच, पानी या जूता सुंघाने जैसी अवैज्ञानिक चीजें) बिल्कुल न डालें। दौरा आमतौर पर 1 से 3 मिनट में अपने आप रुक जाता है।
(10) नाक से खून आना (Nosebleed / Epistaxis)
आपस में टकराने से नाक की अंदर की पतली व मुलायम झिल्ली से रक्त स्राव हो जाता है, जिसे नकसीर कहते हैं।
- सबसे बड़ी गलती (क्या न करें): मरीज का सिर कभी भी आगे की ओर नहीं झुकाना चाहिए।
- सही प्राथमिक चिकित्सा (क्या करें): मरीज को बैठाकर उसका सिर थोड़ा पीछे की ओर (Lean forward) झुकाएं। नाक के नरम हिस्से (नथुनों) को उंगलियों से 10 से 15 मिनट तक लगातार दबाकर (Pinch) रखें और मुंह से सांस लेने को कहें। , खुली हवा में बिठाना चाहिए
- हाइड्रोजन पराक्साइड या पीली मिट्टी की ढेली को पानी में भिगोकर रोगी को सुंघा देना चाहिए।
(11) बिजली का झटका (Electric Shock / Electrocution)
- प्राथमिक कदम: सबसे पहले मुख्य स्विच (Main Switch) बंद करके विद्युत प्रवाह रोकें। यदि ऐसा संभव न हो, तो सूखी लकड़ी, रबर, या प्लास्टिक (विद्युत कुचालक) की मदद से पीड़ित को स्रोत से अलग करें।
- चेतावनी: पीड़ित को कभी भी नंगे हाथों से न छुएं, जब तक कि वह बिजली के संपर्क से पूरी तरह अलग न हो जाए।
- मेडिकल चेक: करंट लगने के बाद हृदय गति रुकने (Cardiac Arrest) की संभावना सबसे अधिक होती है, इसलिए तुरंत सांस और नाड़ी (Pulse) जांचें। जरूरत पड़ने पर तुरंत CPR शुरू करें।
(12) आंखों में चोट (Eye Injuries)
- रसायन (Chemical) गिरने पर: यदि आंख में एसिड या कोई रसायन गिर जाए, तो आंख को तुरंत बहते हुए साफ पानी से 15-20 मिनट तक लगातार धोएं।
- आंख में कोई वस्तु चुभने पर (Penetrating Injury): अगर आंख में कोई कील, कांच या नुकीली चीज चुभ गई है, तो उसे कभी भी बाहर निकालने की कोशिश न करें। इससे आंख की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है। वस्तु के ऊपर एक पेपर कप रखकर पट्टी बांध दें ताकि वह हिले नहीं, और तुरंत अस्पताल ले जाएं।
(13) मधुमेह आपातकाल (Diabetic Emergency – Hypoglycemia)
- यदि कोई मधुमेह (Diabetes) का मरीज अचानक कांपने लगे, पसीना आए और बेहोशी छाने लगे, तो यह हाइपोग्लाइसीमिया (Low Blood Sugar) का लक्षण है।
- क्या करें: यदि मरीज होश में है और निगल सकता है, तो उसे तुरंत कुछ मीठा (ग्लूकोज पाउडर, चीनी का पानी, या चॉकलेट) दें।
- नियम: यदि मरीज पूरी तरह बेहोश हो चुका है, तो उसके मुंह में तरल पदार्थ या चीनी बिल्कुल न डालें (यह फेफड़ों में जा सकता है)।
(14) पानी में डूबना (Drowning)
- प्राथमिकता: डूबने वाले व्यक्ति में ऑक्सीजन की कमी (Hypoxia) सबसे बड़ी समस्या होती है।
- CPR में अंतर: सामान्य कार्डियक अरेस्ट में ‘CAB’ (पहले दबाव, फिर सांस) का पालन किया जाता है, लेकिन डूबने के मामले में (यदि सांस नहीं आ रही है) पहले 5 कृत्रिम सांस (Rescue Breaths) दी जाती हैं, उसके बाद छाती पर दबाव (Chest compressions) शुरू किया जाता है।
- डूबे हुए व्यक्ति के वस्त्रों को उतार देना चाहिए। फिर उसे उल्टा लटकाएँ। इस प्रकार उसके पेट से थोड़ा पानी निकल जायेगा।
- अनेक बार व्यक्ति डूबने से अर्द्ध मूर्च्छित या मूर्छित हो जाता है। इस दशा में रोगी को कृत्रिम श्वास दिया जाना आवश्यक होता है ताकि रोगी की श्वसन क्रिया पुनः हो जाये।
कृत्रिम श्वास की विधियां:
- शैफर विधि: पीड़ित को पेट के बल लिटाएं और उसकी पीठ पर हथेलियों से धीरे-धीरे लयबद्ध दबाव डालकर छोड़ें।
- मुख से मुख विधि (सबसे उत्तम): बचाने वाला व्यक्ति सीधे पीड़ित के मुंह में हवा फूंकता है ताकि फेफड़ों तक हवा पहुंच सके।
- सिलवेस्टर विधि: पीड़ित को पीठ के बल (सीधा) लिटाएं। उसके दोनों हाथों को पकड़कर पीछे अपनी ओर खींचें और फिर उसकी पसलियों पर दबाव डालें।
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